ICAR at a Glance

Telephone Directorory

Links


Publications


  Animal feed blok

  Bakari Palan

  Decomposer

  Khesari

  Paddy Transplanter

  Stiviya

  ICAR BOOK 2019



पूर्ण फीड ब्लॉक ः एक बहु-पोषाक आहार

पशुओं का अच्छा स्वास्थ्य उन्हें प्रदान की गई फीड की गुणवŸा पर निर्भर है। पर्ण फीड ब्लॉक (सी.एफ.बी) एक पूरा नवाचार है जो कि हमारे किसानों को डेयरी पशुअें के संतुलित आहार में सहायता कर सकते है और जिसे दूध उत्पादन और डेयरी फॉर्मिंग से होने वोले लाभ में वृद्धि होती है। एक आर्थिक रूप से व्यवहारिक तकनीक के अलावा इसमें आसान परिवहन, सस्ता भंडारण, बहु पोषण संबंधी कमी को सुधारने, आसान संचालन करने और भोजन की लागत में कमी के रूप में स्थानीय रूप से उपलब्ध फडी समाग्री का उपयोग किया जा सकता है।


फीड ब्लॉको बनाने की प्रक्रिया

पूर्ण फीड ब्लॉक में आम तौर निम्नलिखित रचना होती हैः 50 भागों पुआल, मक्का चूर्ण 20 भाग, चोकर 50 भाग, खल्ली 12.5 भाग, 1 भाग गुड़, 1 भाग खनिज मिश्रण, और 0.5 भाग नमक, जो जानवरों की रख-रखाव की आवश्यकता को पूरा कर सकते है।


पूर्ण फीड ब्लॉक के लाभ

  • इस तकनीक से हम खाद्य, चारा के घाटे को दूर करने के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध पशु चारा संसाधनों का उचित उपयोग कर सकते है।
  • इसमें जानवरों के पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता है।
  • यह पशुओं में बहु पोषक तत्वों की कमी को सुधारने के अतिरिक्त लाभ देता है।
  • फीड़ अप व्यय भी कम करता है क्योकि पशु चयनात्मक भोजन करने में असमर्थ है।
  • यह गुणवता वाले फीड को वर्ष भर उपलब्ध कराता है। और लागत प्रभावी है।
  • यह भरी मात्रा में स्त्रोतो के भंडारण और परिवहन मे सस्ता है और समय और श्रम की बचत भी है।
  • यह खुराक की खराब गुणवता के उपयोग को बढ़ाता है और अपरंपरागत फीड की सुखदाता के बढ़ाता है।
  • पूर्ण फीड ब्लॉक प्राकृतिक आपदाओं के क्षेत्र में लागत प्रभावी है।

  • आहार अवयव मात्रा (%)
    सूखा चारा 50
    मक्का चूर्ण 20
    चेकर 15
    खल्ली 12.5
    छुआ गुड़ 01
    मीन मिक्शचर 01
    नमक 0.5
    कुल 100

    फीड़ ब्लॉक खिलाने की विधि

    गाय और भैंस - 02 फीड ब्लॉक सुबह 02 फीड ब्लॉक शाम सामान्य पशु आहार के साथ 05 फीड ब्लॉक सुबह 05 फीड ब्लॉक शाम जब पशु आहार में केवल फीड ब्लॉक दिया जाए।

    बकरी और भेड - 01 फीड ब्लॉक सुबह और 01 फीड ब्लॉक 0.5 फीड ब्लॉक सुबह और 0.5 फीड ब्लॉक शाम


    सुझाव

    पशु को उसकी इच्छा अनुसार खिलाना बेहतर होगा।



    वैज्ञानिक विधि से बकरी पालन

    हमारे देश में अनेक उन्नत नस्ल की बकरियों का भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उद्भव हुआ है। आज भी अधिकाशं बकरी पालन परंपरागत तरीकें से बकरी पालन कर रहें है, जिससे उत्पादन एवं लाभ बकरियों की उत्पादन क्षमता का लगभग 50ः ही मिलता है। प्रस्तुत लेख वैज्ञानिक पद्यति से बकरी पालन को बताता है जिन्हें अपनाकर लाभ-लागत अनुपात 4ः1 तक प्राप्त किया जा सकता है।


    नस्ल का चुनाव

    1. नस्ल का चुनाव पोषण पद्धति, वातावरण, परिस्थिति की एवं बाजार के अनुरूप हो।
    2. शुद्ध नस्ल की बकरियाँ ही रखें।

    बीजू बकरे का चुनाव

    1. नर शुद्ध नस्ल का, शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ एवं चुस्त हो।
    2. आहार को शरीर भार में परिवर्तित करने की अधिकतम क्षमता हो।
    3. मध्यम एवं बड़े आकार की नस्लों में नर का भार नौ माह की उम्र तक 20-25 किलो तक होना चाहिए।
    4. मां नस्ल के अनुरूप अधिक दूध देने वाली हो।
    5. नर में अपने गुणों को अपनी संतति में छोड़ने की क्षमता हो।
    6. मिलन कराने पर (90ः) बकरियों को गर्भित करता हो।
    7. नर रोग ग्रसित एव संक्रमित रोग का वाहक न हो।

    बकरी का चुनाव

    1. शुद्ध नस्ल की एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होनी चाहिए।
    2. नस्ल के अनुरूप उंचाई- लम्बाई अच्छी होनी चाहिए।
    3. दूध एवं दुग्ध काल अच्छा होना चाहिए।
    4. प्रजनन क्षमता (दो ब्यातों के बीच अन्राल एवं जुड़वा बच्चे पैदा करने की दर) अच्छी हो।

    प्रजनन प्रबंध

    1. पूर्ण परिपक्व होने के बाद ही (डेढ़ से दो वर्ष) बकरे का प्रजनन में उपयोग करें।
    2. एक बकरा 25 से 30 बकरियों को ग्याभिन कराने के लिए पर्याप्त है। 30 से अधिक बकरियों पर बकरों की संख्या बढ़ा देनी चाहिए।
    3. प्रजनक बकरे को एक डेढ़ वर्ष बदल दें। जिससे अन्तः प्रजनन के दुश्परिणामों के बचा जा सके।
    4. मध्यम आकार की नस्लों में प्रथमवार बकरियों को गर्भित कराते समय उनका शरीर भार 16 किलों एवं उम्र 10 माह या अधिक हो।
    5. बड़े आकार की नस्लों में प्रथमवार बकरियां को गर्भित कराते समय उनका शरीर पर 20 किलो एवं उम्र 12 माह होनी चाहिए।
    6. वातावरण को ध्यान में रखते हुए उत्तर-मध्य भारत में बकरियों को अक्टूबर-नवम्बर एवं मई- जून माह में ग्याबिन करायें।
    7. कम प्रजनन एवं उत्पादन क्षमता वाली (10-20ः) एवं रोग ग्रसित मादाओ को प्रतिवर्ष निष्पादन करते रहना चाहिए।
    8. मादाओं को गर्मी में आने पर 10-16 घंटे बाद नर से मिलन करायें।

    पोषण प्रबंधन

    1. नवजात बच्चों को पैदा होने के आधे घंटे के अन्दर खीस पिलायें। इससे उन्हें रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त होती है।
    2. बच्चों को 15 दिन का होने पर हरा चारा एवं रातब मिश्रण खिलाना आरंभ करें तथा 3 माह का होने पर माँ का दूध पिलाना बंद कर दें।
    3. मांस उत्पादन के लिए नर बच्चों को 3 से 9 माह की उम्र तक शरीर भार का 2.5 से 3ः तक समुचित मात्रा में उर्जा (मक्कात्र जौत्र गेंहूँ) एवं प्रोटीन (मूंगफली, अलसी, तिल, बिनौला की खल) अवयब युक्त राबत मिश्रण देवें। इस रातब मिश्रण में उर्जा की मात्रा लगभग 60ः एवं प्रोटीन युक्त अवयब लगभग 37ः खनिज मिश्रण 2ः एवं नमक 1ः होना चाहिए।
    4. वयस्क बकरियों (एक साल से अधिक) एवं प्रजनन के लिए पाले जाने वाले नरों मे उर्जायुक्त अवयबों की मात्रा लगभग 70ः होनी चाहिए। पोषक में खनिजों एवं लवणों का नियमित रूप से शामिल रखें।
    5. जिन बकरियों का दूध उत्पादन लगभग 500 मिली/दिन हो उन्हें 250 ग्राम, एक लीटर दूध पर 500 गा्रम रातब मिश्रण दें। इसके उपरांत प्रति एक लीटर अतिरिक्त दूध पर 500 ग्राम अतिरिक्त रातब मिश्रण देंवे।
    6. बकरियों के बाड़े में छगाई करने के लिए चारा वृ़क्ष जैसे नीम, पीपल, बेर, खेजड़ी, पाकर, बबूल खूब लगाएं।
    7. दूध देने वाली, गर्भवती बकरियो (आखिर के 2 से 3 माह) एवं बच्चों (3 से 9 माह) को 200 से 350 ग्राम प्रतिदिन रातब मिश्रण दें।
    8. हरे चारे के साथ सूखा चारा अवश्य दें। अचानक आहार व्यवस्था में बदलाव न करें एवं अधिक मात्रा में हरा एवं गीला चारा न दें ।

    आवास प्रबंधन

    1. एक वयस्क बकरी को 3-4 वर्गमीटर ढका क्षेत्रफल की आवश्यकता होती है।
    2. पशु गृह में पर्याप्त मात्रा में धूप, हवा एवं खुली जगह हो।
    3. सर्दियों में ठंड से एवं बरसात में बौछार से बचाने के व्यवस्था करें।
    4. पशु गृह को साफ एवं स्वच्छ रखें।
    5. छोटे बच्चों को सीधे मिटटी के सम्पर्क में आने से बचने के लिए फर्श पर सूखी घास या पुआल बिछा दें तथा उसे तीसरे दिन बदलते रहें।
    6. बर्षा ऋतु से पूर्व एवं बाद में फर्श के उपरी सतह की 6 इंच मिटटी बदल दें।
    7. छोटे बच्चों, गर्भित बकरियों एवं प्रजनक बकरे की अलग आवास व्यवस्था करें।
    8. ब्यांत के बाद बकरी तथा उसके बच्चों को एक सप्ताह तक साथ रखें।

    स्वास्थ्य प्रबंधन

    1. वर्षा ऋतु से पहले एवं बाद में (साल में दो बार) कृमि नाशक दवा पिलायें।
    2. रोग निरोधक टीके (मुख्यतः पी.पी.आर., ई.टी., पोक्स, एफ. एम. डी. इत्यादि) समय से अवश्य लगवायें।
    3. बीमार पशुओं को छटनी कर स्वस्थ पशुओं से अलग रखें एवं तुरंत उपचार कराएँ।
    4. आवश्यकतानुसार बाह्य परजीवी के उपचार के लिए व्यूटोक्स (0.1 प्रतिशत) का घोल से स्नान करायें।
    5. नियमित मल परीक्षण (विशेषकर छोटे बच्चों) करायें।

    सामान्य प्रबंधन

    1. बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद साफ कपड़े से उसके नथुनों की सफाई करें।
    2. नवजात बच्चों की नाभिनाल को शरीर 3 सेंमी नीचे बाँधकर उसके लगभग एक सेमी नीचे काटकर टिंचर आयोडीन 2-3 दिन तक लगायें।
    3. प्रत्येक बकरी की पहचान के लिए टेंगिंग आवश्यक करें जिससे उसकी वंशावली, खान-पान, आदि की सटीक जानकारी मिल सके।
    4. बकरिकयों का साफ पानी दिन में (2-3बार) पिलायें।
    5. जिन बकरिययों के नीचे दूध कम हो उनके बच्चों को उस बकरी के आस-पास ब्यायी बकरियों का दूध पिलाए।
    6. जिन बकरियों का खुर बढ़ जाते हैं उनकों समय पर काट दें।
    7. प्रतिमाह बच्चों के शरीर भार को तोलते रहें जिससे उनकी बढ़वार व स्वास्थ्य का पता चलता रहे।

    बाजार प्रबंधन

    1. जानवरों को मांस के लिए शरीर भार के अनुसार बेचें।
    2. सामान्यतया मांस के बाजार भाव का 55 प्रतिशत शरीर पर बाजार में भाव मिलता है।
    3. शुद्ध नस्ल एवं उच्च गुणवŸा के जानवरों को प्रजनक बकरी फार्मो को बेचने पर अधिक लाभ होता है।
    4. मांस उत्पादन के लिए पाले गए नरों को लगभग 1 वर्ष की उम्र पर बेचें दें। इसके उपरांत शारीरिक भार वृद्धि बहुत कम (10-15 ग्राम प्रतिदिन) एवं पोषण खर्च अधिक रहता है।
    5. बकरी पालक संगठित होकर उचित भाव पर बकरियों को बेंचे।
    6. बकरों को विशेष त्योहार (ईद, दुर्गा पूजा) के समय पर बेचन पर अच्छा मुनाफा होता है।